विचार

हमारा नहीं तो हमारे बच्चों के रूप में ही सही, काश… लौट आता हमारा बचपन…!

Get Latest Update on Whatsapp
अनिल कुमार

आज मैंने चने का होरहालगाया। गांव में तोचने के खेत केकिनारे मेड़ पर हीघासफूस या पुआल(धान के पौधे केसूखे डंठल) में आग लगाकर चने के झाड़को पका लेते थे।पर यहां मंडी मेंचने के फल हीमिले। उन्हें मैंने गैस चूल्हे परकड़ाही में पकाया औरनमकमिर्च के साथ खाया।बड़ा मजा आया, लेकिनगांव की याद भीबहुत आयी।

FB IMG 15198720534252605 1%2B%255B719672%255D - Banka Live

 

IMG 20211011 WA0011 - Banka Live

होली की छुट्टियों मेंजब गांव जाते, तबदादाजी कहते। का करइत लोग, खाना खा लेल, जा तनी गोरैया थान(गांव में अलगअलगजगह के खेतों कोअलगअलग नाम सेपुकारा जाता है, जैसेहेठिला गेड़ा, अरहा पर, चिरवामें, दक्खिन भर……) उहां बुंट(चना) रोपल हे। तीनचार घंटा अगोर.. (रखवाली कर) हमसभी भाइयों के मन मेंलड्डू फूटते। धीरे से आपसमें बात करते औरसलाई (माचिस) और नमकमिर्चपाॅकेट में रख लेते।साथ ही दो अंटिया( धान के पौधे केसूखे डंठल के बंडल) भी एक छोटी लाठीमें टांग लेते। अंटियादेख दादाजी पूछते, काहे लाहो….

FB IMG 15198720634625996 - Banka Live



हम भाइयों में से कोईतपाक से बोलता, अरिया(आरी, मेड़) पर बिछा केबइठे ला बाबा। हमपोते किसके थे। दादाजी हमारीचालाकी समझ जाते औरकहते देख होरहा करेला होतवा दक्खिन औरपछियारी कोना से उखाड़िह।वोहिजा होरहा लाइक दाना बढ़ियानिकलल हई। साथ हीचेताते भी। आऊर हां, चना अपने ही खेतसे उखाड़िह, दोसर के खेतसे ना। (कई बारहमलोग शरारत करते और दूसरेके खेत से चनेका झाड़ उखाड़ करअपने खेत की मेड़पर होरहा लगाते।) होरहा खेत में अरिएपर करिह लोग। हांबाबा, हां बाबा। औरहम दौड़ पड़ते गोरैयाथान, चन के खेतकी ओर…
काश, हमारा बचपन लौट आता।हमारा नहीं तो हमारेबच्चों के रूप मेंही सही!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)


Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button