बांका

BANKA : अगर यही लॉक डाउन है, तो फिर सामान्य जनजीवन क्या है!

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बांका लाइव डेस्क : बाजारों में उमड़ती भीड़, सड़कों पर भारी चहल-पहल, पैदल चलने वालों के उत्साही झुंड से लेकर वाहनों की फर्राटा आवाजाही, दुकानों पर किसी पर्व त्यौहार की खरीदारी जैसी अनियंत्रित भीड़, गहने, कपड़े, रेडीमेड, कॉस्मेटिक्स से लेकर जूते चप्पल और मिठाई तक की खुली दुकानें, तीन चौथाई लोगों के चेहरे पर मास्क तक नहीं, कहीं कोई फिजिकल डिस्टेंसिंग नहीं.. सब कुछ सामान्य…! अगर यही लॉक डाउन है, तो फिर सामान्य दिनों में चलने वाला सामान्य जनजीवन क्या है…?

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बांका शहर के कचहरी रोड का नजारा

बांका जिले के संवेदनशील और जिम्मेदार तबके में ये सवाल और चर्चा चिंता की लकीरें सुर्ख कर रही हैं। बांका में लगातार बढ़ रहे कोरोना पॉजिटिव मामलों की वजह से बांका और जिले भर के जिम्मेदार लोगों में बेचैनी बढ़ी है और यही बेचैनी इन सवालों और चर्चा को बल प्रदान कर रहे हैं।

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दरअसल, बांका शहर सहित जिलेभर में इन दिनों यही माहौल है। जबकि अभी बांका सहित देशभर में लॉक डाउन 4 जारी है। सच तो यह है कि बांका में जब कभी लॉक डाउन की बात हुई तो इसका असर सड़कों तक ही कायम रहा। वह भी तभी तक, जब तक पुलिस और पुलिस की सायरन बजाती गाड़ियों की मौजूदगी यहां की सड़कों पर रही। लॉक डाउन 1 से लेकर लॉक डाउन 4 के अंतिम चरण तक में लॉक डाउन को यहां के ज्यादातर लोगों ने कभी अपनी जिम्मेदारी समझी ही नहीं। बस पुलिस और प्रशासन की वजह से इसे अपनी मजबूरी समझते रहे।

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लॉक डाउन के दौरान जरूरी सामानों की खरीदारी के लिए मिली छूट का लाभ पहले भी लोगों ने उत्सव के तौर पर लिया और आज भी ले रहे हैं। तभी तो बाजारों में आधे से ज्यादा लोग बिना वजह सिर्फ यह देखने के लिए निकल पड़ते हैं कि आज का माहौल कैसा है! खुले मैदानों में क्रिकेट से लेकर अन्य खेलकूद चलते रहे। बाहर से शटर गिरी दुकानों में अंदर से खरीद बिक्री होती रही। सब्जी की बंद दुकानों और गोदामों में बैठकें लगती रहीं। यह सब कुछ लॉक डाउन के दौरान पहले भी चल रहे थे.. आज भी चल रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में लगने वाली हाटों की स्थिति और भी खराब है जहां लॉक डाउन को लोगों ने अर्थहीन बनाकर रख छोड़ा है।

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बांका में मछली की एक दुकान का दृश्य

बांका में लॉक डाउन के बावजूद सड़कों पर भारी भीड़ उमड़ रही है। इतनी ज्यादा कि किसी उत्सव या मेले का एहसास होता है। यहां सरकारी अनुमति से पूर्व से ही मांस मछली की दुकानें खुलती रही हैं। जरूरी खरीदारी के लिए निर्धारित समय के बाद भी कुछ दुकानें पहले भी खुलती थीं और आज भी खुल रही हैं। उन पर किसी की नजर तक नहीं है। पुलिस भी अब मानो थक चुकी है। लॉक डाउन का पालन करवाने के लिए पुलिस की गतिविधि भी निर्धारित समय पूरा होने पर लोगों को घर जाने और दुकानें बंद करने की हिदायत देने के लिए माईकिंग तक सीमित रह गई है।

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