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BANKA : इस बार टूट गई सदियों की परंपरा, नहीं निकली भगवान मधुसूदन की रथयात्रा

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बांका लाइव ब्यूरो : बांका में रथयात्रा को लेकर इस बार सदियों की परंपरा टूट गई। भगवान मधुसूदन की रथयात्रा मंगलवार को नहीं निकल पाई। फलस्वरूप इस आयोजन को लेकर टकटकी लगाए हजारों श्रद्धालुओं को घोर निराशा हुई। हालांकि प्रशासन का कहना है कि वैश्विक महामारी कोरोना के प्रकोप से उत्पन्न हालात को देखते हुए इस बार भगवान मधुसूदन की रथ यात्रा पर विराम लगाना मजबूरी थी।

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भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा को शर्तों के साथ सुप्रीम कोर्ट द्वारा मंजूरी दिए जाने के बाद यहां के लोगों में भी उम्मीद जगी थी कि शायद भगवान मधुसूदन की रथ यात्रा के आयोजन को भी प्रशासनिक स्तर पर हरी झंडी मिले। मंगलवार की सुबह तक लोगों की यही उम्मीद यहां बनी रही। कुछ लोगों ने प्रशासन के अधिकारियों से भी इस संबंध में बात की। लेकिन बताया गया कि ऊपर से ही इस संबंध में कोई स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं है। इसलिए यात्रा की अनुमति देना संभव नहीं।

बांका जिले के पौराणिक मंदार अंचल में बसे प्राचीन वालिसा नगरी (अब बौंसी) में भगवान मधुसूदन का प्राचीन और भव्य मंदिर अवस्थित है। मंदिर में भगवान मधुसूदन की चंद्रमणि पत्थर निर्मित मनोहारी प्रतिमा स्थापित है। भगवान मधुसूदन को भगवान जगन्नाथ के आर्य का दर्जा प्राप्त है। हर वर्ष यहां भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा की तर्ज पर भगवान मधुसूदन की रथ यात्रा आयोजित होती है।

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यह आयोजन न सिर्फ बांका जिला बल्कि बिहार एवं झारखंड के कई जिलों तक ख्याति प्राप्त है और दोनों राज्यों के विभिन्न जिलों से तकरीबन 50 हजार से ज्यादा श्रद्धालु इस आयोजन में भाग लेने के लिए हर वर्ष यहां पहुंचते हैं। इस अवसर पर एक दिन का बड़ा मेला यहां लगता है।

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कहते हैं कि भगवान मधुसूदन की रथयात्रा की परंपरा करीब 515 वर्षों की रही है। करीब 515 वर्ष पूर्व 1905 ईस्वी में चैतन्य महाप्रभु यहां पधारे थे और उन्होंने ही धूमधाम से इस आयोजन की परंपरा की यहां नींव रखी थी। तब से लगातार गत वर्ष तक भगवान मधुसूदन की रथयात्रा का आयोजन अहर्निश धूमधाम से चलता रहा। लेकिन इस वर्ष यह परंपरा टूट गई। हालांकि शाम में करीब 5:00 बजे मंदिर के पुजारियों और प्रबंध समिति की सहमति से किसी तरह परंपरा निर्वहन के नाम पर भगवान मधुसूदन की रथ यात्रा की मंदिर परिसर में ही झांकी निकाली गई जिसमें सीमित संख्या में लोगों की भागीदारी रही। पूजा पाठ एवं आरती का भी आयोजन हुआ लेकिन सरकारी निर्देशों का पूरी तरह ख्याल रखा गया।

इस वर्ष कोरोना संकट को लेकर पिछले कई महीनों से जारी लॉकडाउन को देखते हुए ही इस बात की आशंका श्रद्धालुओं को होने लगी थी कि शायद इस बार भगवान मधुसूदन की रथयात्रा के आयोजन पर भी ग्रहण लगे। दुर्योगवश ऐसा ही हुआ। भगवान के रथ की रंगाई पुताई तक इसबार नहीं हुई।

मंगलवार को सुबह से लोग मधुसूदन मंदिर में पूजा अर्चना के लिए पहुंचने लगे। लेकिन जो धूमधाम और चहल पहल रथयात्रा को लेकर यहां होनी चाहिए थी वह इस बार यहां नहीं दिखी। श्रद्धालु भी निराश दिखे। मेला नहीं लग पाने की वजह से व्यापारियों में भी निराशा के भाव छलक रहे थे। इस बार आगंतुकों की भी भीड़ नहीं के बराबर रही। कुछ लोग इस उम्मीद में यहां आए जरूर कि शायद अंतिम क्षणों में रथयात्रा की अनुमति मिले। लेकिन ऐसा नहीं हो पाने से उन्हें भी निराशा हुई।

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