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EXCLUSIVE : 400 सालों का है सुप्रसिद्ध रूपसा दुर्गा मंदिर का इतिहास

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बांका लाइव (अभिषेक आनंद) : बांका के इस सुप्रसिद्ध दुर्गा मंदिर का करीब 400 सालों का इतिहास रहा है। जी हां, हम बात कर रहे हैं बांका जिला अंतर्गत रजौन प्रखंड के रूपसा स्थित ऐतिहासिक दुर्गा मंदिर की जिसकी स्थापना करीब 400 वर्ष पूर्व इसी गांव के बंगाली कायस्थ हाथी लाल दत्त के परिवार द्वारा की गई थी। आज भी मेढ़पति इसी परिवार के वंशज ओमित कुमार दत्त हैं। 

रूपसा देवी मंडप में शरद कालीन भगवती पूजन की शुरुआत बोधन कलश स्थापना के साथ ही हो जाती है। उस दिन माता के आगमन के समय कुबेर देव के 9 कौड़ियों को लुटाया जाता है और एक छाग यानी बकरे की बलि प्रदान की जाती है। इसी दिन से मंदिर में चंडी पाठ आरंभ हो जाता है।

ग्रामीण सत्यनारायण सिन्हा, अभिषेक आनंद, संजय कुमार सिन्हा, एडवोकेट विनय कुमार दास, देवेंद्र कुमार मिश्र, रंजीत कुमार मिश्र आदि ने बताया कि यहां डाक साज पहनाने की परंपरा पूर्वजों से ही चली आ रही है। मेले में जिला प्रशासन का भी सहयोग प्राप्त होता है। चतुर्थी पूजन में माता को नदी से आह्वान कर मंडप में लाया जाता है और उस दिन भी कौड़िया लुटाई जाती हैं।

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पुनः छः पूजा को संध्या समय गंधाधिवास पूजा का आयोजन होता है। सप्तमी को संध्या समय मेढ़ पर प्रतिमा चढ़ाने की परंपरा है। उसके बाद माता का आह्वान मनपत्रिका स्नान पास ही स्थित चांदन नदी में संपन्न होता है। इस दिन सात कौड़ियां लुटाई जाती हैं और एक काले बकरे की बलि दी जाती है।

अष्टमी को प्रातः से माता का कपाट भक्तों के लिए खोल दिया जाता है। इस बांग्ला पद्धति से किए जाने वाले पूजन को बहुत ही नियम निष्ठा से संपन्न किया जाता है। पंडित सुबोध मिश्र का कहना है कि अष्टमी के दिन संधिपूजन और संध्या के समय संधि बलि प्रदान करने की भी परंपरा इस मंडप में होती चली आ रही है।

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नवमी के दिन सभी बंगाली समाज के लोग मंदिर में पूर्वज की परंपरा से ही अखंड दीप प्रज्वलित करते हैं। साथ ही इस दिन माता को बलि प्रदान किया जाता है। यहां लगभग 500 के आसपास पशु बलि नवमी को प्रदान किया जाता है। यह खास बात यह भी है कि नवमी के दिन मुराद पूरी होने से संतुष्ट भक्तों द्वारा माता को मुकुट भी चढ़ाया जाता है।

इस दुर्गा मंदिर में महानवमी के अवसर पर काफी संख्या में मुंडन संस्कार का भी आयोजन किया जाता है। दसवीं के दिन प्रातः दही चूड़ा आदि का भोग लगाते हुए कुमारी कन्या को भोजन कराया जाता है। संध्या समय में बंगाली कायस्थ समुदाय की महिलाएं सिंदूर की होली खेलकर विजयादशमी मनाती हैं। फिर पुरुष वर्ग मूर्ति को कंधे पर लेकर समस्त रूपसा ग्रामीणों के सहयोग से गांव भ्रमण करते हुए चांदन नदी में माता की प्रतिमा विसर्जित कर दी जाती है।

प्रतिमा विसर्जन के बाद सभी ग्रामीण आपस में गले मिलकर सारे गिले-शिकवे दूर करते हैं। अपनी खुशहाली की कामना माता दुर्गा से करते हैं। प्रतिमा विसर्जन के उपरांत मंदिर में अपराजिता पूजन आयोजित होता है जिसमें हल्दी, जयंती आदि प्रसाद के रूप में ग्रामीणों को प्रदान किया जाता है। इस दिन एक बकरे की बलि पुनः प्रदान की जाती है।

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