विचार

हाय! आरक्त कपोल देख, क्या तुम्हें दया न आएगी…

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        रूठो ना प्रिय
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सौध- सदन में प्रिय हैं ऐसे
उर-मिला हेतु खड़े हों जैसे
परिरम्भण का आमंत्रण या
उपालम्भ है मन-मर्यादा का

कहो प्रिय रूष्ट मन का क्या मान करूं
हो मुदित तुम कैसे तुमको मैं तुष्ट करूं

बांहों का दूं मैं हार प्रिय या
कृष्ण कुन्तलों की छांव हो
अश्रुमाला नयनों की गुंथूं या
सरोज पुट पर हृदय का नैवेद्य हो

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कहो प्रिय कहो कैसे प्रीत अपनी मैं पुष्ट करूं
हो मुदित तुम कैसे तुमको मैं तुष्ट करूं

लज्जा छोड़ करूं आज प्रिय कार्य तुम्हारा
तेरे ही सम्मुख लूं आज प्रिय नाम तुम्हारा

कह दे जगती विषम कुछ आज मुझे
रखना ना हृदय में कुछ भार प्रिय
अपराधिनी बन स्वयं की स्व को छलुं
कहो कैसे अपनी ही नज़रों से गिरूं

हाय! आरक्त कपोल देख
क्या तुम्हें दया न आएगी
लज्जानत आनन पर भी
क्या मान-दर्प दिखलाएगी

जाओ फिर हौसला नहीं , अब इससे अधिक
मानिनि मैं भी कुछ,अबला नहीं इससे अधिक

मान भी जाओ प्रिय ना अब यों तुम दुष्ट बनो
रीति जा रही प्रेम घड़ी ना अब मुझसे रूष्ट रहो

                                   — रजनी सिंह 

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